जुड़ा



सीधी नाक, बदीसी  आँखे, वो वाइड सी मुस्कान

और जुड़ा बांधे युध पर निकली मेरी नार 

दिनभर की जंग जीतने वो जुड़ा बांध चली

घर से निकलकर दूसरोंकी आँखे बचाती  वो निकल पड़ी

दिन ढलने का इस कदर यूँ इन्तजार था

कि जुड़ा खोल , तंग दुनिया छोड़, डूब जाती 

हम दोनों हमारे प्यार मे खो जाते

वो बिखरे बाल रातभर पूरी दोपहर कि धुप सुनाते

ऑफिस कि बाते हो, रास्तों कि भीड़ हो 

बॉस का चिलाना हो , या कैसे मात करी सारी परेशानी हो 

वो जुड़ा खोल नादान बचा बन जाती है

महक उठा है घर का रोशंदान

झूम उठते है परदे और नाच उठती खिडकिय और दरवाजे 

वो चार दीवारे ठहर जाती है 

सुकुन बहने लगता है घर के कोने में

वो जुड़ा खोल आने का नाद उठता है सभि दिशाओ मे

सीधी नाक, बदीसी आँखे, वो वाइड सी मुस्कान

और जुड़ा बांधें  युध पर फिर  निकली मेरी नार 


-प्रियंका रॉय

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